Sunday, 8 January 2012

नज़्म – “कंपकपाते हाथ”

दिन हो चाहें रात ओढ़े तन पे इक मन थान सब,
कंपकपाते हाथ गोया सर्द मौसम आ गया.

थोड़ी सी ही बात पर अब खौलता है खून सब,
कंपकपाते हाथ गोया इंकलाबी आ गया.

इक जुनूँ यह भी जहाँ बन जानवर इन्सान सब,
कंपकपाते हाथ गोया कत्ल में थर्रा गया.

लालची का साथ पाकर लालची शैतान सब,
कंपकपाते हाथ गोया इल्म-ए-रिश्वत आ गया.

ढेर सारे मशविरे औ कुछ किताबी ज्ञान सब,
कंपकपाते हाथ गोया पल मिलन का आ गया.

जब अधूरा ज्ञान जा बैठे मियाँ इम्तिहान सब,
कंपकपाते हाथ गोया सख्त परचा आ गया.

पाला पोसा नाज़ से था, दी दुआओं की अजान,
कंपकपाते हाथ गोया रुखसती पल आ गया. (बेटी की रुखसती)

अब नहीं सुलगे अंगीठी गीली लकड़ी जान सब,
कंपकपाते हाथ गोया है बुढ़ापा आ गया.

था जिगर अब शांत उनका अलविदा अज्ञान सब,
सध रहे थे हाथ गोया रुखसती पल आ गया. (दुनिया से रुखसती)

(गोया / Goya - speaking, as if)

राजेश सक्सेना "रजत"
                                                         06.01.12

Saturday, 31 December 2011

"नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें"

कुछ पल सज लें,
कुछ पल महकें,
कुछ पल बहकें.

कुछ गलबहियां,
झूमें नच लें.

जब पल आये,
नभ में,
टूटे तारे संग,
हम WISH कर लें.

लाये खुशियाँ भर,
आने वाला कल,
हो सुप्रभात,
हर दिन,
हर पल,
हम आनन्दित हों,
सब WISH पूरी हों,
ऐसा प्रभु, जीवन सबको दे दें.

"नव वर्ष की शुभकामनायें" आपके लिए.

                                                   राजेश सक्सेना "रजत"


Tuesday, 20 December 2011

“खाड़ी युद्ध”

(This poem was written in the backdrop of “खाड़ी युद्ध”)

ये युद्ध की विभीषिका,
ये गर्जना, ये तर्जना,
ये साम, दाम, दंड, भेद,
ये शक्ति का, प्रचंड वेग,
ये आह कैसी उठ रही,
जय गीत कोई गुन रहा,
क्यों इर्ष्या मचल रही,
अधर्म छटपटा रहा,
है रक्त दोष आज फिर,
वीभत्स रूप ला रहा,
समष्टि, संविधान सब,
बिखर रहे, अरण्य से,
मनुष्यता मनुष्य की,
पुरुषत्व डगमगा रहा.

                                    राजेश सक्सेना "रजत"
                                              1990-91


Friday, 4 November 2011

गीत – “महंगाई”

हद है कर दी, हद है कर दी, (हद्दे कर दई, हद्दे कर दई,)
इस सरकार ने, हद है कर दी. (इस सरकार ने, हद्दे कर दई.)

खेतन के मालिक की मेहनत,
आलू गाँव में, एक रुपैया.
जब शहरन की, मंडी पहुंचा,
दस रुपैया, जेबें कट गयीं.

हद है कर दी, हद है कर दी, (हद्दे कर दई, हद्दे कर दई,)
इस सरकार ने, हद है कर दी. (इस सरकार ने, हद्दे कर दई.)

जो हमने था, नीड़ बनाया,
मांग रुपैया, गिरवी काया.
सूद खोर, सरकार के कारण,
हाय, हमारी जान, निकल गयी.

हद है कर दी, हद है कर दी, (हद्दे कर दई, हद्दे कर दई,)
इस सरकार ने, हद है कर दी. (इस सरकार ने, हद्दे कर दई.)

जब हम, नंगे पाँव थे चलते,
मोटर गाड़ी, आदत डाली.
अब तक, लॉलीपॉप खिलाकर,
सत्ता ने अब, गर्दन पकड़ी.

हद है कर दी, हद है कर दी, (हद्दे कर दई, हद्दे कर दई,)
इस सरकार ने, हद है कर दी. (इस सरकार ने, हद्दे कर दई.)

जब हम, साधू, बन कर, रहते,
फाँक, हवा हम, जी भी लेते.
धर्म का ढोंगी, हमको कहकर,
पा ली सत्ता, सब कुछ चर गयी.

हद है कर दी, हद है कर दी, (हद्दे कर दई, हद्दे कर दई,)
इस सरकार ने, हद है कर दी. (इस सरकार ने, हद्दे कर दई.)

Thursday, 3 November 2011

"मैं और तू"

तेरी पेशानी पे, ये शिकन कैसी,
मौत मेरी है, तुझे जलन कैसी.

रफ्ता-रफ्ता होती थी, जिंदगी बसर,
नज़र भेड़िये की, क्यूँ कर लगी ऐसी.

अल्लाह से माँग कर, साँसे जो ले रहा था,
तेरे नाम की हिचकी, गले में फाँस, लगी जैसी.

कायदा मौत का जो, मुझको तू समझा रहा,
पहले तू मर के दिखा, वरना तेरी ऐसी की तैसी.

काबिले गौर, तेरे हाथ का, खंजर है,
तेरे लब पे, मेरी वाह, आज सजी वैसी.

(पेशानी – Forehead, शिकन – Wrinkle)

Sunday, 23 October 2011

"दीपावली के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं"

आतिशें चल रहीं, रौशिनी हर तरफ,
झिलमिलाते दियों का, समय आ गया.
टिमटिमाते दियों का, समय आ गया.

है मुबारक घड़ी, घर में भगवान हैं,
हाँ छछूंदर पे बैठा,  कोई आ गया.

था दियों को लगाया, हरेक द्वार पर,
मेरी किस्मत, उजाला था, घर आ गया.
उसकी रहमत, उजाला था, घर आ गया.

था बुहारा ये घर, लीप कर हर तरफ,
संग रोली सजाकर, सजन भा गया.

सब दुआएं बुजुर्गों की, बख्शीश  थीं,
उनके चरणों को छू कर, मजा आ गया.
छू के चरणों को जन्नत, था मैं पा गया.

इस दिवाली से तुम, इतना रौशन बनो,
इस दिवाली से तुम, इतना ऊँचा उठो,
हर कोई कह उठे, आफताब आ गया.

(आफताब – Sun)

Tuesday, 11 October 2011

"घर-घर में संगीत"

मूसल, इमामदस्ते में, कुछ, इस तरह बजे,
बारीक हो रही, हर चीज़, धुन सजे.
                
फटकते सूप से, लगता है कोई, साज़ बज रहा,
मिटटी निकल रही, कूड़ा निकल रहा.

रगड़ती, गाय, अपनी पूँछ से, आवाज़ आती है,
है उसमें जान, परिंदों को वोह, पहचान जाती है.

जो फुकनी फूँकते, चूल्हे में सुर, ऐसा ही लगता है,
सुलगती आग है, औ, पतीले में, खाना पकता है.

अँधेरे कमरे में, मच्छर, कुछ यूँ , भिनभिनाते हैं,
होश न खोओ, "जागते रहो", राग गाते हैं.

कोठरी में रखा संदूक, खुले तो कुछ गुनगुनाये है.
तकलीफ घर में हो, अमानत काम आए है.

शादी औ रौनकों में, फूल की परातें निकल रहीं,
सजें पकवान, लें, लुत्फ़ मेहमान, औ गिलासें खनक रहीं.

खौलता दूध कड़ाहे में, कड्छुल शोर बरपाए,
बने रबड़ी, मलाई, सब उंगली चाट-चाट खाएं.

जो जच्चा को हो बच्चा, घर में थाली या तवा बजता,
मुरादें पूरी करता जो, उसका दरबार फिर सजता.